ये गोया आदमी भी आदमी होता
लिहाज़-ए-इश्क़ भी तो लाज़मी होता
ज़मीं या आसमाँ तेरे कभी होते
कभी मैं तेरे आँखों की नमी होता
दिलों-दिल रंज भी तो काग़ज़ी रहता
उसे फिर दूर करना बाहमी होता
हवाएँ तेज़ आए और टकराए
बयारों का सफ़र तो मौसमी होता
अदावत रंजिशें कब ख़त्म ये होगी
अदू भी तो 'मनोहर' आदमी होता
As you were reading Shayari by Manohar Shimpi
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