kaise rangat tere chehre ki padi hai | कैसे रंगत तेरे चेहरे की पड़ी है

  - Manohar Shimpi

कैसे रंगत तेरे चेहरे की पड़ी है
हिज्र में वहशत की जैसे ये घड़ी है

जब यकायक ही निगाहें चार होती
इस तरह मिलने की हसरत फिर बड़ी है

दूर कितने भी रहे है कोई मंजिल
जुस्तुजू फिर आरज़ू से ही बड़ी है

बेवफ़ाई 'इश्क़ में जब भी लगे है
फिर मुहब्बत में लिखी धोखाधड़ी है


तेज साँसें इस-क़दर क्यूँँ हो किसी की

जब कभी आफ़त लगे सब से बड़ी है


कोई भी मल्बूस में क्या ख़ूब लगती
देख के तुझ को ख़ुशी मिलती बड़ी है

  - Manohar Shimpi

Bewafai Shayari

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