तेरे ही किसी कोई फ़ैसले से पड़ी कभी वो दरार थी
न समझ सके उसे इक झलक वो निगाह ख़ूब शरार थी
तेरे से कभी न कही तेरे मेरे बीच में वो जो बात थी
तेरे हुस्न और शबाब से कभी एक क़ौल-क़रार थी
मेरे हम-नफ़स न जुदा तेरे से हुए मिले किसी रात में
वो बुझी कहाँ वो दिए कि लौ कोई भी नज़र में शरार थी
तिरे साथ कौन उसी घड़ी कोई बे-सबब ही खड़ा हुआ
तिरे ज़िंदगी के उतार और चढ़ाव में वो दरार थी
तुझे देखते न तभी लगे कोई बात है जो ख़बर बनी
तेरे साथ फिर से जो कुछ हुआ वो जो रात ख़ूब सरार थी
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