yuñ chaar din kii bahaaron ke qarz utaare ga.e | यूँँ चार दिन की बहारों के क़र्ज़ उतारे गए

  - Manoj Azhar

यूँँ चार दिन की बहारों के क़र्ज़ उतारे गए
तुम्हारे बाद के मौसम फ़क़त गुज़ारे गए

ज़रा सी दूर तो सैलाब के सहारे गए
भँवर में उलझे तो फिर हाथ पाँव मारे गए

सदा का देर तलक गूँजना बहुत भाया
फिर एक नाम बयाबाँ में हम पुकारे गए

छुपा छुपा के जो रातों ने ख़्वाब रक्खे थे
वो सारे दिन के उजालों के हाथ मारे गए

कुछ एक चेहरे मिरी चश्म-ए-तर में तैरते हैं
कुछ इक सफ़ीने अभी तक न पार उतारे गए

  - Manoj Azhar

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