सफ़र में मुश्किलें आएँ तो जुरअत और बढ़ती है

कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है

बुझाने को हवा के साथ गर बारिश भी आ जाए
चराग़-ए-बे-हक़ीक़त की हक़ीक़त और बढ़ती है

मिरी कमज़ोरियों पर जब कोई तन्क़ीद करता है
वो दुश्मन क्यूँ न हो उस से मोहब्बत और बढ़ती है

ज़रूरत में अज़ीज़ों की अगर कुछ काम आ जाओ
रक़म भी डूब जाती है अदावत और बढ़ती है

अगर बिकने पे आ जाओ तो घट जाते हैं दाम अक्सर
न बिकने का इरादा हो तो क़ीमत और बढ़ती है

— Nawaz Deobandi

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