यूँँ मेरे दिल के चराग़ों को बुझाते क्यूँ हो
मेरी तकलीफ़ को तुम और बढ़ाते क्यूँ हो
तुम सेे छुपता ही नहीं चेहरे पे दिख जाता है
इतनी शिद्दत से मसाइल को छुपाते क्यूँ हो
मौत के तुम वो फ़रिश्ते जो मिटाते दुनिया
रहनुमाई का तमाशा ये दिखाते क्यूँ हो
तुमने बारूद पे दुनिया को बिठा रक्खा मियाँ
फिर किसी और को मुजरिम यूँँ बनाते क्यूँ हो
दिल की दहलीज़ अँधेरों से सनी है बिल्कुल
जल रहा दिल का दिया झूठ बताते क्यूँ हो
'नित्य' शैताँ की हिमायत में लगे शाम-ओ-सहर
रोज़ इंसान को इंसाँ से लड़ाते क्यूँ हो
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