राह-ए-इश्क़ एक हसीं मुझ को सफ़र लगता है
पर मुझे मंजिलों से 'इश्क़ के डर लगता है
शाख़-ए-दिल पर यूँँ गुलाबों का शजर लगता है
हम-सफ़र तुम सा हो तो सीधा डगर लगता है
शाम थक हार के जब काम से घर जाता हूँ
माँ को आवाज़ दूँ तो घर मेरा घर लगता है
यूँँ ज़मीं पर दिलों की ग़ज़लें नहीं फूटती हैं
लफ़्ज़ों को सींचने में ख़ून-ए-जिगर लगता है
टूटी कश्ती में उतरता हुआ दरिया मानो
जैसे सदियों का कोई प्यासा बशर लगता है
किसी की राह के पत्थर हटा दो हो सके तो
फिर सफ़र जिंदगी का एक सफ़र लगता है
आज भी धड़कनें उस से मेरी वाबस्ता हैं
दर्द उठता है उधर और इधर लगता है
As you were reading Shayari by Raj Tiwari
our suggestion based on Raj Tiwari
As you were reading undefined Shayari