दिए की धड़कनों की लौ हवा की ओर चले
बा-वफ़ा के यूँँ क़दम बे-वफ़ा की ओर चले
शाख से टूट के पत्ते हवा की ओर चले
जिस तरह टूटे हुए दिल ख़ुदा की ओर चले
इस ज़माने की अदा आप निभाते रहिए
हम हैं अहल-ए-वफ़ा सो हम वफ़ा की ओर चले
जिस्म के क़ैद से आज़ाद हुई रूह इस तरह
जिस तरह राख बदन की ख़ला की ओर चले
हम सितारों के सफ़र से नहीं लौटेंगे 'राज'
कैसे मुमकिन है कोई इब्तिदा की ओर चले
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