ग़ज़ल को ज़िंदगी अब गुनगुनाना चाहती है
हमारे पास आने का बहाना चाहती है
रखा था 'उम्र भर गुल ने जिसे पलकों पे अपने
वो तितली आसमाँ में आशियाना चाहती है
हमें अब आरज़ू है सब परिंदे लौट आएँ
हमारी शाम शाख़ों को हँसाना चाहती है
हमारी पलकों पर सावन उतरना चाहता है
बहार आँखों में आकर मुस्कुराना चाहती है
नदामत होती है दीवानगी से लफ्ज़-गर के
मगर वो हम-सफ़र कोई दिवाना चाहती है
जो ख़्वाबों के दरीचे से लगी है एक चिलमन
तिरी उँगली पकड़कर साथ जाना चाहती है
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