फूल के जिस्म पे रंग चलने लगा
रात ढलने लगी दिन निकलने लगा
ऐ ख़ुदा क्या मुहब्बत गुनाह है बता
आज फिर तेरा मौसम बदलने लगा
जान जाएगी फिर रफ़्ता रफ़्ता मेरी
बूँद गिरने लगी दिल मचलने लगा
ऐ पुजारी ज़रा चढ़ के मन्दिर से देख
चाँदनी रात में कौन जलने लगा
किसके दिल में चुभन उठ रही है अभी
हिज्र के ताप में कौन जलने लगा
इतनी ख़ुशबू किधर से चली आ रही
बाल खोले हुए कौन चलने लगा
जब कहा था मुहब्बत में मर जाएँगे
ऐ मेरी जान फिर क्यूँँ बदलने लगा
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