ज़िंदगी के आख़िरी दिन यूँँ बिताऊँगा

मैं नदी के इक किनारे घर बनाऊँगा

तुम मुझे मिलने किसी शनिवार आ जाना
मैं तुम्हारा रेत पे बिस्तर लगाऊँगा

चाँदनी में लेट के तुम चाँद देखोगे
फूल के काँधे पे मैं तितली बिठाऊँगा

तुम मुझे दिल में छुपा के रख न पाओगे
मैं तुम्हारे लब पे आके मुस्कुराऊँगा

दूर हो तो प्यार का इज़हार क्या करना
तुम कभी जब पास आओगे बताऊँगा

उस से मिलने की तमन्ना है मुझे लेकिन
वो अगर मिलने को आएगा तो जाऊँगा

गर ख़ुदा मुझ को भी गढ़ने का हुनर दे तो
मैं तुम्हारे हाथ का कंगन बनाऊँगा

नाम पे विश्वास है तो सोच के रक्खो
चाँद कहती हो तो इक दिन डूब जाऊँगा

रो रही हो तुम मेरे परदेस जाने पे
क्या तुम्हें लगता है मैं वापस न आऊँगा

ये मुलाक़ातें भी काफ़ी हैं मुहब्बत में
कौन कहता है कि तुम को भूल जाऊँगा

तुम मुझे बर्बाद कर के ख़ुश हो तो आमीन
तुम हुए बर्बाद तो मैं याद आऊँगा

उम्र भर अब कौन किस को याद रखता है
धीरे धीरे मैं भी तुम को भूल जाऊँगा

सारी दुनिया अपने ग़म से रो रही 'राकेश'
मैं तुम्हारा ग़म इन्हें कैसे सुनाऊँगा

— Rakesh Mahadiuree

More by Rakesh Mahadiuree

Other ghazal from the same pen

See all from Rakesh Mahadiuree →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling