तसव्वुर बढ़ता जाता है मगर सूरत नहीं मिलती
कि मुमकिन है ख़ुदा मिल जाए पर हसरत नहीं मिलती
मुझे मालूम है दुनिया मुझे कब तक पुकारेगी
किराए के मकानों में कभी ज़ीनत नहीं मिलती
चमकते चाँद ने मुझ को कभी इतना बताया था
किसी को टूट के चाहो भी तो उजलत नहीं मिलती
तो फिर जन्नत हक़ीक़त में नहीं है मान ले ज़ाहिद
हमारे साथ रहकर भी अगर जन्नत नहीं मिलती
यूँँ मेरे सामने बढ़-चढ़ के मत आ ऐ अमीर-ए-शहर
तेरे जैसे अमीरों से मेरी क़ीमत नहीं मिलती
मैं कहता था तुम्हें मर जाऊँ तो क़ीमत न कम होगी
कि देखो इक भी तुर्बत से मेरी तुर्बत नहीं मिलती
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