tasavvur badhta jaata hai magar soorat nahin milti | तसव्वुर बढ़ता जाता है मगर सूरत नहीं मिलती

  - Rakesh Mahadiuree

तसव्वुर बढ़ता जाता है मगर सूरत नहीं मिलती
कि मुमकिन है ख़ुदा मिल जाए पर हसरत नहीं मिलती

मुझे मालूम है दुनिया मुझे कब तक पुकारेगी
किराए के मकानों में कभी ज़ीनत नहीं मिलती

चमकते चाँद ने मुझ को कभी इतना बताया था
किसी को टूट के चाहो भी तो उजलत नहीं मिलती

तो फिर जन्नत हक़ीक़त में नहीं है मान ले ज़ाहिद
हमारे साथ रहकर भी अगर जन्नत नहीं मिलती

यूँँ मेरे सामने बढ़-चढ़ के मत आ ऐ अमीर-ए-शहर
तेरे जैसे अमीरों से मेरी क़ीमत नहीं मिलती

मैं कहता था तुम्हें मर जाऊँ तो क़ीमत न कम होगी
कि देखो इक भी तुर्बत से मेरी तुर्बत नहीं मिलती

  - Rakesh Mahadiuree

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