शब-ए-ग़म दिल मेरा बहला रही थी
तुम्हारी याद मुझ को आ रही थी
मुझे कल रात जाने क्या हुआ था
लबों पे आग लगती जा रही थी
वो मेरे पास ही बैठा था लेकिन
मुझे इक याद उस की खा रही थी
मुझे कुछ पल को ऐसा लग रहा था
कि मेरी नब्ज़ डूबी जा रही थी
किसी के वास्ते मरते नहीं हैं
मुझे कल ज़िन्दगी समझा रही थी
जिसे मैं नींद में मिलता था अक्सर
वो लड़की दूर चलती जा रही थी
क़मर अंबर में उड़ता जा रहा था
मुहब्बत दिल मेरा दहला रही थी
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