vo log jo zinda hain vo mar jaayenge ik din | वो लोग जो ज़िंदा हैं वो मर जाएँगे इक दिन

  - Saqi Faruqi

वो लोग जो ज़िंदा हैं वो मर जाएँगे इक दिन
इक रात के राही हैं गुज़र जाएँगे इक दिन

यूँ दिल में उठी लहर यूँ आँखों में भरे रंग
जैसे मिरे हालात सँवर जाएँगे इक दिन

दिल आज भी जलता है उसी तेज़ हवा में
ऐ तेज़ हवा देख बिखर जाएँगे इक दिन

यूँ है कि तआक़ुब में है आसाइश-ए-दुनिया
यूँ है कि मोहब्बत से मुकर जाएँगे इक दिन

यूँ होगा कि इन आँखों से आँसू न बहेंगे
ये चाँद सितारे भी ठहर जाएँगे इक दिन

अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है
मुद्दत हुई सोचा था कि घर जाएँगे इक दिन

  - Saqi Faruqi

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    दामन में आँसुओं का ज़ख़ीरा न कर अभी
    ये सब्र का मक़ाम है गिर्या न कर अभी

    जिस की सख़ावतों की ज़माने में धूम है
    वो हाथ सो गया है तक़ाज़ा न कर अभी

    नज़रें जला के देख मनाज़िर की आग में
    असरार-ए-काएनात से पर्दा न कर अभी

    ये ख़ामुशी का ज़हर नसों में उतर न जाए
    आवाज़ की शिकस्त गवारा न कर अभी

    दुनिया पे अपने इल्म की परछाइयाँ न डाल
    ऐ रौशनी-फ़रोश अँधेरा न कर अभी
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    Saqi Faruqi
    मैं फिर से हो जाऊँगा तन्हा इक दिन
    बैन करेगा रूह का सन्नाटा इक दिन

    जिन में अभी इक वहशी आग के साए हैं
    वो आँखें हो जाएँगी सहरा इक दिन

    बीत चुका होगा ये ख़्वाबों का मौसम
    बंद मिलेगा नींद का दरवाज़ा इक दिन

    मिट जाएगा सेहर तुम्हारी आँखों का
    अपने पास बुला लेगी दुनिया इक दिन

    डूब रहा हूँ झूट और खोट के दरिया में
    जाने कहाँ ले जाए ये दरिया इक दिन

    मैं भी लौट आऊँगा अपने तआ'क़ुब से
    तुम भी मुझ को ढूँढ के थक जाना इक दिन
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    Saqi Faruqi
    इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते
    ये बात किसी और से कह भी नहीं सकते
    Saqi Faruqi
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    मैं तेरे ज़ुल्म दिखाता हूँ अपना मातम करने के लिए
    मेरी आँखों में आँसू आए तिरी आँखें नम करने के लिए

    मिट्टी से हुआ मंसूब मगर आतिश-ख़ाना सा जलता हूँ
    कई सूरज मुझ में डूब गए मेरा साया कम करने के लिए

    वो याद के साहिल पर सारे मोती बिखराए बैठी थी
    इक लहर लहू में उट्ठी थी मुझे ताज़ा-दम करने के लिए

    आज अपने ज़हर से काट दिया सब ज़ंग पुराने लफ़्ज़ों का
    आइंदा के अंदेशों की तारीख़ रक़म करने के लिए

    मुमकिन है कि अब भी होंटों पर कोई भूला बिसरा शो'ला हो
    मैं जलते जलते राख हुआ लहजा मद्धम करने के लिए
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    Saqi Faruqi
    ये ख़ामुशी का ज़हर नसों में उतर न जाए
    आवाज़ की शिकस्त गवारा न कर अभी
    Saqi Faruqi

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