दो पल की मशहूरी है
आगे फिर बे-नूरी है
कइयों का वो सपना है
जो तेरी मजबूरी है
शायद ही कल ख़ास लगे
वो जो आज ज़रूरी है
घर के साथ जुड़े हैं घर
पर लोगों में दूरी है
मैं जिस के बिन आधा हूँ
वो मेरे बिन पूरी है
जो मरने तक करनी है
जीवन इक मज़दूरी है
— Sarvjeet Singh















