इस जीवन में ऐसे उलझे बात न होने पाई
औरों से क्या मेरी ख़ुद से बात न होने पाई
उन सेे मिल कर बातें तो की पर ऐसा लगता है
उन से मिल कर के भी उन से बात न होने पाई
दिन हफ़्तों में और महीने सालों में बदले हैं
याद नहीं अब ये भी कब से बात न होने पाई
जिन को वादे कर रक्खे हैं उन को कॉल करेंगे
सब से बात करेंगे जिन से बात न होने पाई
As you were reading Shayari by Sarvjeet Singh
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