जाने कितनी बार कहा है ख़ुदस तेरी ओर न देखूँ
पर जब तेरी ओर न देखूँ तो मैं ख़ुद की ओर न देखूँ
जब तक आँखों को दिखता है ऐसा कैसे हो सकता है
अपनी छत पे आऊँ मैं और तेरी छत की ओर न देखूँ
As you were reading Shayari by Sarvjeet Singh
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