हो जहाँ के वहीं के हो जाओ
जाओ गोशानशीं के हो जाओ
लौट जाओ असल पे तुम अपनी
आबशारों ज़मीं के हो जाओ
रास आएगा बस वतन तुमको
चाहे बच्चों कहीं के हो जाओ
छोड़ दो दुनिया भर के सब मसले
और सहरानशीं के हो जाओ
बेचकर तुम क़लम को अब अपनी
जाओ कुर्सीनशीं के हो जाओ
मेरी बस्ती को मानकर अंबर
आओ तारों ज़मीं के हो जाओ
As you were reading Shayari by Shadan Ahsan Marehrvi
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