मसअले 'इश्क़ के मैं हल कर दूँ
जज़्बा-ए-दिल में जो बदल कर दूँ
तेरी रंगत में ढाल कर मिसरे
तुझ सेे मंसूब इक ग़ज़ल कर दूँ
वहशत-ए-हिज्र है मुझे दरपेश
कैसे मुमकिन है इसको हल कर दूँ
शे'र मंसूब जो न हों तुझ सेे
उन
में पैदा कोई ख़लल कर दूँ
वक़्त से जो मिले हसीं लम्हें
नाम तेरे वो सारे पल कर दूँ
तू जो कह दे तो फिर तेरी ख़ातिर
मैं भी तामीर इक महल कर दूँ
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