जो शख़्स कभी खुल के न बोला मेरे आगे
रोया तो बहुत टूट के रोया मेरे आगे
ख़ुद तो नहीं बदला वो बदलता है मगर रोज़
बातें कभी लहजा कभी हुलिया मेरे आगे
मंसूब जो तुझ से है वो लम्हा नहीं दूँगा
रख दे कोई दुनिया का ख़ज़ाना मेरे आगे
बारात ग़मों की है मुसलसल मेरे पीछे
चलता है मसर्रत का जनाज़ा मेरे आगे
भटका हूँ मैं ऐसे तुझे पाने की लगन में
मंज़िल मेरे पीछे है तो रस्ता मेरे आगे
जिस दिन से समाया है मेरे दिल में तेरा नूर
अब नाक रगड़ता है उजाला मेरे आगे
— Shakir Dehlvi















