तो क्या कुछ भी नहीं क़ीमत हमारी
अगर अच्छी नहीं सूरत हमारी
ज़ियादा है कहीं लागत हमारी
लगाओ ठीक से क़ीमत हमारी
झपकना भूल जाओगे ये पलकें
करेगी रक़्स जब वहशत हमारी
मिले होते हमें तुम काश पहले
लिखी जाती थी जब क़िस्मत हमारी
यही इक ऐब है मरते हैं तुम पर
यही इक ऐब है शोहरत हमारी
हमें तुम मुस्कुरा कर देख लेना
हमें मिल जाएगी क़ीमत हमारी
यहीं बैठी थी माँ कुछ देर पहले
यहीं पर थी अभी जन्नत हमारी
ज़रा मिलने से पहले सोच लेना
तुम्हें पड़ जाएगी आदत हमारी
— Shakir Dehlvi















