और किसी शख़्स शै में न अब दिल रहा
आप को देख कर बस सुकूँ मिल रहा
आज वक़्त-ए-ख़िज़ाँ याँ से रुख़सत हुआ
दिल के गुलशन में इक गुल नया खिल रहा
दिल पे अपना कभी बस चला ही नहीं
कोई मेरे सिवा याँ पे दाख़िल रहा
नींद में खो गए आज की रात हम
कोई ख़्वाब-ओ-ख़्यालों में शामिल रहा
मुस्कुराते रहे वक़्त के साथ साथ
अपने जीवन का बस ये ही हासिल रहा
— shampa andaliib















