क्या कहें ख़्वाब बस ख़्वाब ही रह गए
हम वहीं आ गए जिस जगह से चले
फिर किसी याद में मुब्तिला हो गई
आज फिर बज गए एक दो रात के
बाम-ओ-दर रहगुज़र हम सफ़र ग़म-गुसार
सब बदल से गए देखते देखते
दम-ब-दम हम चले जा रहे हैं फ़क़त
देखते हैं कहाँ किस जगह दिल लगे
मैं भी साहिल से नीचे उतरने लगी
कोई आया नहीं जब इधर लौट के
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