गर ज़ियादा नहीं तो थोड़ी हो
बात कुछ देर हो पर अच्छी हो
एक कमरा हो कुछ किताबें हों
और खिड़की से धूप आती हो
क्या ज़रूरत पड़े किसी की अगर
दोस्त में बात दोस्त जैसी हो
ऐसी ख़्वाहिश पनप गई दिल में
'उम्र कट जाए जो न पूरी हो
जाने किस कैफ़ियत में होगा वो
जिस को हर एक बात चुभती हो
ऐसे लोगों से बात क्या की जाए
जिन की हर एक बात झूठी हो
जाने वाले चले गए शम्पा
आप किस कैफ़ियत में बैठी हो
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