sab yaar mere khoob kamaane men lage the | सब यार मेरे ख़ूब कमाने में लगे थे

  - Shariq Kaifi

सब यार मेरे ख़ूब कमाने में लगे थे
हम पिछली कमाई को लुटाने में लगे थे

वो छत भी गई सर से जो दुनिया थी हमारी
हम कौन सी दुनिया को बचाने में लगे थे

रोने को जिन्हें आज सजाई है ये महफ़िल
अच्छे वो किसी और ज़माने में लगे थे

किस सच का उन्हें सामना करने से था इंकार
क्यूँ लोग मिरा झूठ छुपाने में लगे थे

मा'सूम थे इतने कि जुदा होने के दिन भी
फूलों से तेरे घर को सजाने में लगे थे

बैठे थे सभी दिल के दरीचों को किए बंद
और घर को हवा-दार बनाने में लगे थे

मैं किस को वहाँ क़ैद की रूदाद सुनाता
सब अपने गिरफ़्तार गिनाने में लगे थे

  - Shariq Kaifi

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