चार ही दिन थे क्या ज़िन्दगी के लिए
ना मिला कोई भी आशिक़ी के लिए
हाथ आँखों पे धरने लगा चाँद अब
एक उस की ही बेपर्दगी के लिए
पूजते है उसे जो कि दिखता नहीं
लोग सब करते है बंदगी के लिए
देता है तो दे इक दो सदी ऐ ख़ुदा
चार दिन कम है आवारगी के लिए
ना गिला कोई ना ही शिकायत कोई
कुछ तो हो उन सेे नाराजगी के लिए
आदमी देता है हर जहाँ को ख़ुशी
ख़ुद तरसता है इक इक ख़ुशी के लिए
दुख भरी ज़िन्दगी के सिवा दुनिया में
अब बचा ही क्या है आदमी के लिए
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