जब भी घर के दर-ओ-दीवार से उक्ताते हैं
लोग दरिया की तरफ़ ख़ुद ही चले जाते हैं
जो चले जाते नहीं आते दोबारा मुड़ कर
वहम आता है फ़क़त लोग नहीं आते हैं
फिर समझते हैं इसी सम्त है अपना सब कुछ
आप की सम्त ही जब यार क़दम जाते हैं
वाक़िआ है ये तसव्वुर के जहाँ का जानाँ
अपनी ऊँगली से तिरी ज़ुल्फ़ को सहलाते हैं
हम गरीबों की तमन्नाएँ हैं बेवा जैसी
चाहते रहते हैं कुछ लुत्फ़ नहीं पाते हैं
संग-ए-मरमर की सड़क रास नहीं आती हमें
ठोकरें जान के हम लोग यहाँ खाते हैं
दिल को तकलीफ़ तो होती है मगर हम सोहिल
एक क़तरा भी निगाहों में नहीं लाते हैं
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