साँस आए कभी चली जाए
हार जाएँ या मात दी जाए
ऊबने लग गया हूँ अब मौला
मेरे अंदर से ख़ामुशी जाए
क्या मरज़ है मुझे पता हो गया
अब तो दिल से ये बेकली जाए
बस ये कहता रहा फ़क़त रोगी
मौत आ जाए ज़िंदगी जाए
कुछ मरीज़ों से मैं तो बेहतर हूँ
हाए कुछ की तो क्या कही जाए
कौन ज़िंदा है अस्पतालों में
मौत बिस्तर टटोलती जाए
एक हस्सास आदमी की व्यथा
एक औरत से क्या कही जाए
ज़ीस्त मुझ को अज़ीज़ है 'सोहिल'
मौत सीने से क्यूँँ लगी जाए
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