RAAHI
RAAHI
Ghazal

मैं भी निकला घर से पछता लेने

ग़म से ही ग़म का घर लुटवा लेने

ज़ालिम है घर वाले मेरे, मत आ
मत आ मेरे आशिक़, चाँटा लेने

हम भी दिल हारे बैठे है जानम
आना तो होगा ही ख़तरा लेने

घर वालों ने तेरे इज़्ज़त तो दी
क्या कहता मैं, आया धोखा लेने

उन को तो मैं तेरा दुल्हा लगता
जो आया दुल्हन से रुसवा लेने

जाने जाॅं तुम वापस मत आ जाना
अब मुझ से फिर कोई वा'दा लेने

बोला था मत आना, फिर क्यूँ आए
चाहत है वापस, या बदला लेने

'राही' के दिल में ख़ंजर दे कर
आई हो क्या झगड़े सुलझा लेने ?

— RAAHI

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