अगर मैं ख़ुद-कुशी करने से डर जाता
तो मैं जो इतना तन्हा था किधर जाता
मेरी ख़ामोशी से पड़ता नहीं था फ़र्क
मेरे रोने पे कैसे कोई मर जाता
मोहब्बत है ये कोई क़ैद थोड़ी है
तू कहती तो मोहब्बत से मुकर जाता
सुकूॅं से ज़िंदगी मेरी गुज़र जाती
तू मेरे पास इक दो दिन ठहर जाता
तेरी बातों में आने से तो अच्छा था
मैं सुनता अपने दिल की और मर जाता
— ABhishek Parashar















