chal pada tha dekhkar main maut ka rastaa khula | चल पड़ा था देखकर मैं मौत का रस्ता खुला

  - Upendra Bajpai

चल पड़ा था देखकर मैं मौत का रस्ता खुला
ऐन वक़्त-ए-ख़ुदकुशी पंखे से पर फंदा खुला

और फिर इक रोज़ उसने लब मेरे लब पे रखे
और फिर इक रोज़ मुझपे मीर का मिसरा खुला

मुझको रोता देखने की चाह थी उसकी सो अब
छोड़ देता हूँ मैं अक्सर रात दरवाज़ा खुला

और फिर इक दिन किसी से चैट उसकी देख ली
और फिर इक दिन हमारी अक्ल का ताला खुला

  - Upendra Bajpai

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