जैसे हर एक दरिया समंदर से जा लगे
उम्र-ए-रवाँ भी मौत का ही सिलसिला लगे
कमरे में तीन रोज़ से जो चीख़ रहा है
हो सकता है वो कल से तुम्हें बे-सदा लगे
आँगन में किसी रोज़ खिले इक उदास फूल
और वो उदास फूल मेरा तर्जुमा लगे
वहशत भी है ब्लेड भी लेकिन किसी सबब
बस चाहता नहीं हूँ कि उसको बुरा लगे
यानी मैं किसी रोज़ जा टकराऊँ कार से
यानी कि ख़ुदकशी भी मेरी हादसा लगे
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