जैसे हर एक दरिया समुंदर से जा लगे
उम्र-ए-रवाँ भी मौत का ही सिलसिला लगे
कमरे में तीन रोज़ से जो चीख़ रहा है
हो सकता है वो कल से तुम्हें बे-सदा लगे
आँगन में किसी रोज़ खिले इक उदास फूल
और वो उदास फूल मेरा तर्जुमा लगे
वहशत भी है ब्लेड भी लेकिन किसी सबब
बस चाहता नहीं हूँ कि उस को बुरा लगे
या'नी मैं किसी रोज़ जा टकराऊँ कार से
या'नी कि ख़ुदकशी भी मेरी हादसा लगे
— Upendra Bajpai















