hua jab jab kahiin bhi bebasi ka zikr | हुआ जब जब कहीं भी बेबसी का ज़िक्र

  - Viru Panwar

हुआ जब जब कहीं भी बेबसी का ज़िक्र
लगा मुझ को वो मेरी ज़िंदगी का ज़िक्र

हम आख़िर मिलना छोड़ें भी तो किस किस से
जो भी मिलता है करता है उसी का ज़िक्र

हाँ दिल दुखता है हम बेरोज़गारों का
कोई करता है जब भी नौकरी का ज़िक्र

जी उस के हुस्न पे पड़ ही गया भारी
गली में उस की मेरी सादगी का ज़िक्र

हमारे फ़न को जो कोई भी समझेगा
करेंगे हम उसी से शायरी का ज़िक्र

  - Viru Panwar

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