फूलों से दोस्ती हुई ही नहीं
मुझ से ख़ुशबू तेरी गई ही नहीं
दुनिया में वो सभी रहे गुमनाम
जिन पे तेरी नज़र पड़ी ही नहीं
गया बेकार रोज़ का मिलना
उसे आदत मेरी लगी ही नहीं
तुम बहुत ही हसीन हो लेकिन
उस की कोई बराबरी ही नहीं
सिर्फ़ चेहरा ही देखा है उस का
उस की आवाज़ तो सुनी ही नहीं
उस को पैग़ाम भेजते कैसे
उस तरफ़ की हवा चली ही नहीं
शायरी से लगाव हो जिस को
ऐसी लड़की मुझे मिली ही नहीं
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