दश्त में जब हवाएँ खींचती हैं
हर दिए की शुआएँ खींचती हैं
चाँद का नूर खींचे चेहरा तेरा
और ज़ुल्फ़ें घटाएँ खींचती हैं
छोड़कर यारों को न जाऊँ मगर
जान-ए-दिल की अदाएँ खींचती हैं
जानिब-ए-दश्त ख़्वाबगह से मुझे
फिर किसी की सदाएँ खींचती हैं
अब तो लाज़िम है टूट जाना मेरा
मुझको चारों दिशाएँ खींचती हैं
इन खिलौनों की क्यूँ दुकानों से
अपने बच्चों को माएँ खींचती हैं
मुझको हर बार मुश्किलों से "अमान"
मेरी माँ की दुआएँ खींचती हैं
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