Hamza ali

Hamza ali

@Hamza

Hamza ali shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Hamza ali's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

मैं तो अपने ख़सारे पर भी हँसता हूँ समझ तो है तिजारत के उसूलों की — Hamza ali
देते तो हैं मशवरे लोगों को हम भी यूँँ मोहब्बत में बहुत पर बताने के लिए भी कोई क़िस्सा अपना यूँँ है ही नहीं — Hamza ali
ये भी तो एक तहक़ीक़ में बड़ी मुश्किल से पता चला है कामयाबी तक इश्क़ काफ़ी लड़कों ने मुल्तवी किया है — Hamza ali
हाँ सोच लिया है ये अब से कि नहीं मिलना तो ख़्वाब में भी यूँँ ही बेदार रहेंगे हम — Hamza ali
दिल की बेचैनी का कुछ तो हो सबब याद आए कोई ग़म हो कोई तो — Hamza ali
तुझे अपनी ग़ज़ल कह दूँ मगर ये मसअला भी है मोहब्बत सब को इस महफ़िल में तुझ सेे ही न हो जाए — Hamza ali
तेरे जाते हुए क़दमों से ये सदा आती है लौट कर यूँँ न आने की भी तो अदा आती है — Hamza ali

Ghazal

Nazm

"काग़ज़" क्या लिखते हो काग़ज़ पर काग़ज़ पर एहसास लिखता हूँ काग़ज़ पर जज़्बात लिखता हूँ काग़ज़ पर राज़ लिखता हूँ नज़्म लिखता हूँ काग़ज़ पर अच्छा लिखने वालों ने क्या नहीं लिखा काग़ज़ पर इश्क़ से नफ़रत तक सब लिखा है काग़ज़ पर किसी ने ख़्वाब लिखे हैं काग़ज़ पर किसी ने मुआहिदे लिखे हैं काग़ज़ पर मुल्क बँटे हैं काग़ज़ पर कुछ चित्र बने हैं काग़ज़ पर कहीं मुकदमे लिखे हैं काग़ज़ पर किसी के अँगूठे लगे हैं काग़ज़ पर आँसू पड़े हैं काग़ज़ पर शायद कुछ दर्द लिखे काग़ज़ पर किसी ने तक़रीर लिखी है काग़ज़ पर किसी का शे'र लिखा है काग़ज़ पर मैं ने नाम तुम्हारा लिखा है काग़ज़ पर — Hamza ali
"इंक़लाब" वो सोचता है मैं उस की वहशत लिखूँगा लोगों के दिलों की दहशत लिखूँगा वो झूठे ख़्वाब लिखूँगा लेकिन अब मैं इंक़लाब लिखूँगा अब मैं सैलाब लिखूँगा उबलते ख़ूनों से तक़दीर लिखूँगा उन की असली तस्वीर लिखूँगा उस का हम पर हर एक ज़ुल्म लिखूँगा दिए गए सारे ग़लत हुक्म लिखूँगा रोते बच्चों की चीख लिखूँगा हमें दी गई ग़लत सीख लिखूँगा वो जो हमें दिखाए गए डरावने ख़्वाब लिखूँगा गिरती लाशों का हिसाब लिखूँगा घर में बंद लोगों का डर लिखूँगा बाहर फिरते लोगों का ख़ौफ़ लिखूँगा उन की हर एक चाल लिखूँगा दिलों का अब मैं हाल लिखूँगा लोगों का साथ लिखूँगा वो अँधेरी गहरी रात लिखूँगा ख़ून से रंगे हाथ लिखूँगा मैं सारी बात लिखूँगा वो ख़ून से भरा वो कुआँ लिखूँगा उस यतीम की बद-दुआ लिखूँगा वो ज़वाल लिखूँगा दबते हुए सवाल लिखूँगा हर रोज़ खुदती नई क़ब्र लिखूँगा झूठी फैलती ख़बर लिखूँगा लोगों का टूटा सब्र लिखूँगा लूटते घर लिखूँगा बेवजह कटते सर लिखूँगा ग़ैर होते अपने लिखूँगा उन बच्चों के सपने लिखूँगा ज़ालिम का ज़ोर लिखूँगा हर तरफ़ मचता शोर लिखूँगा ख़ाली मैदान लिखूँगा भरे क़ब्रिस्तान लिखूँगा — Hamza ali