“मेहँदी”
जब उस की मेहँदी का रंग सुर्ख़ नहीं हुआ
तो उस ने सोचा मैं ने उसे प्रेम नहीं किया
ये भी तो हो सकता है मेहँदी मिलावटी हो
या फिर उस ने जल्दी ही मेहँदी धो दी हो
परंतु मेरे प्रेम का पैमाना उस मेहँदी ने तय किया
और देखा जाए तो सही किया
यदि मेरा प्रेम सच्चा है
तो मेहँदी को हर हाल में रच जाना चाहिए था
मिलावटी होना या जल्दी धो देना तो केवल
समाज के वे रीति रिवाज हैं
जिन्हें तोड़कर ही प्रेम किया जाता है
और मेरा प्रेम इन्हें नहीं लाँघ पाया
या'नी मेरा प्रेम सच्चा नहीं था
मेहँदी को रच जाना चाहिए था
— Hamza ali















