"इंक़लाब"

वो सोचता है
मैं उस की वहशत लिखूँगा
लोगों के दिलों की दहशत लिखूँगा
वो झूठे ख़्वाब लिखूँगा
लेकिन अब मैं इंक़लाब लिखूँगा
अब मैं सैलाब लिखूँगा
उबलते ख़ूनों से तक़दीर लिखूँगा
उन की असली तस्वीर लिखूँगा
उस का हम पर हर एक ज़ुल्म लिखूँगा
दिए गए सारे ग़लत हुक्म लिखूँगा
रोते बच्चों की चीख लिखूँगा
हमें दी गई ग़लत सीख लिखूँगा
वो जो हमें दिखाए गए डरावने ख़्वाब लिखूँगा
गिरती लाशों का हिसाब लिखूँगा
घर में बंद लोगों का डर लिखूँगा
बाहर फिरते लोगों का ख़ौफ़ लिखूँगा
उन की हर एक चाल लिखूँगा
दिलों का अब मैं हाल लिखूँगा
लोगों का साथ लिखूँगा
वो अँधेरी गहरी रात लिखूँगा
ख़ून से रंगे हाथ लिखूँगा
मैं सारी बात लिखूँगा
वो ख़ून से भरा वो कुआँ लिखूँगा
उस यतीम की बद-दुआ लिखूँगा
वो ज़वाल लिखूँगा
दबते हुए सवाल लिखूँगा
हर रोज़ खुदती नई क़ब्र लिखूँगा
झूठी फैलती ख़बर लिखूँगा
लोगों का टूटा सब्र लिखूँगा
लूटते घर लिखूँगा
बेवजह कटते सर लिखूँगा
ग़ैर होते अपने लिखूँगा
उन बच्चों के सपने लिखूँगा
ज़ालिम का ज़ोर लिखूँगा
हर तरफ़ मचता शोर लिखूँगा
ख़ाली मैदान लिखूँगा
भरे क़ब्रिस्तान लिखूँगा

— Hamza ali

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