तेरी यादों से रिहाई ही नहीं है

इस मरज़ की भी दवाई ही नहीं है

वो मुझे अपने मुख़ालिफ़ मानता है
मेरी तो कोई लड़ाई ही नहीं है

ज़ेहन में कुछ यूँ तू उलझा तो लगा है
इस दफ़ा कोई रिहाई ही नहीं है

जो कभी छोड़ी न जाए हम ने भी वो
लत कभी ऐसी लगाई ही नहीं है

तुम ज़रा बेचैन हो सुन कर के ऐसी
बात तुम को वो बताई ही नहीं है

उस ने छोड़ा है मगर मैं ने अभी भी
ये मोहब्बत यूँ गँवाई ही नहीं है

शे'र हम कुछ यूँ सुना तो देते हैं पर
पेशे में कोई कमाई ही नहीं है

— Hamza ali

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