Ehsan Akbar

Top 10 of Ehsan Akbar

    हवा मिरी राज़-दाँ नहीं है
    कि चतर इस का
    हज़ार सायों पे मेहरबाँ है
    करोड़ों लोगों के सोज़-ए-अन्फ़ास का धुआँ है
    हवा फ़क़त उस नहीफ़ लम्हे की दास्ताँ है
    कि जिस का आलम गुज़िश्तनी है
    जो इक नफ़स का ही मेहमाँ है
    हवा ही सारी महक उगलती हुई बहारों की तर्जुमाँ है
    हमारे अंदर छुपे वजूदों
    सुबुक मसामों की राज़-दाँ है
    गुज़रते जिस्मों को नश्र करती हुई हवा राज़-दाँ नहीं है
    मगर हवा तेरे मेरे ख़्वाबों के दरमियाँ साँस
    फूँकती है
    हमारी साँसों की डोरियों को
    हमारे जिस्मों से जोड़ती है
    हमारे ताँबे हमारे पीतल हमारे सब सागवान चेहरे
    हमारे अपनों के तन की ठंडी महक के ग़ाज़े से
    ढाँपती है
    मिरा हवा से फ़क़त यही एक राब्ता है
    उसे मिरा राज़-दाँ न कहना
    हवा से अपने अज़ाब-ए-लम्हात की कोई दास्ताँ न कहना
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    Ehsan Akbar
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    जुदाई और क्या है मैं जिसे सहता नहीं रहता
    ये तुम से रोज़ का मिलना
    जुदा होने से पहले देर तक
    इक बात से इक बात तक
    लफ़्ज़ों का लुढ़काना
    नए मौसम की बातें
    आलिमाना गुफ़्तुगूएँ उन मनाज़िर की
    सियासत जिन का चेहरा कल दिखाएगी
    मुलाक़ातें हैं और ऐसी मुलाक़ातें
    कि बाहम रोज़ का मिलना न मिलना
    कोई भी अर्ज़िश नहीं रखता
    ये कैसा वस्ल है
    जिस में
    हदें मिटती नहीं
    बातों से बातों का मिलाना
    मैं से तू तक का सफ़र भी बन नहीं पाता
    ये कैसे राब्ते हैं
    कुर्सियों से कुर्सियाँ मिलती हैं
    लेकिन दरमियानी फ़ासले मिटते नहीं
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    Ehsan Akbar
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    ये तुम सब
    कि जिन के सरों में जवानी का ख़ूँ लहलहाता है
    मुझ से रसीद अपनी मेहनत की भी लेते जाओ
    मोहब्बत के बारे में जो भी किसी ने बताया है
    पूरी हक़ीक़त नहीं
    क्यूँकि चाहत रिवायत नहीं
    तज्रबा है
    हक़ीक़त में हर आदमी मोहतरम है
    वो ख़ुद उस की जब तक न तरदीद कर दे
    ये पहले भी मैं ने कहा था
    तुम्हारे लबों से जो कानों को पहुँचे
    वो हर्फ़ इस्म-ए-आज़म हो
    देखो वही
    जिस में कल की बशारत
    हिदायत हर इक ख़ैर की
    ताज़ा एहसास की रौशनी हो
    जो कानों में उतरे
    तुम उस में से अमृत निथारो
    कि अमृत में दिल रूह और ज़ह्न की
    तीस बीमारियों की शिफ़ा है
    ज़बाँ पर वो तासीर रखना
    कि जिस से ज़माने को ख़ुद अपनी पहचान हो
    अपने हर इल्म को आप ही देखना और अपनी ज़बाँ से ही पढ़ना
    ज़माने को छूना
    कि हर नस्ल ने जो हक़ाएक़ तराशे
    वो अपने ही हाथों घड़े हैं
    कि हर अहद ने आग को छू के ही आग माना
    ये तुम भी करोगे
    ये सब तुम भी करना
    किताबों को बस सूँघना छोड़ देना
    ये कुल्ली सदाक़त नहीं हैं
    तुम्हारे ज़माने से पहले के लिखे हुए नादिर औराक़
    कल की हर इक पेश-बीनी से आरी हैं
    इन सब किताबों के पहले वरक़
    सिर्फ़ इस वास्ते
    ख़ाली रक्खे गए हैं
    कि तुम इन पे अपने ज़माने की सच्चाइयाँ लिख के जाओ
    हम ऐसों की ख़ातिर
    जिन्हें कल तुम्हारा लिखा पढ़ के फिर याद करना है
    आते हुओं को सुनाना है
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    Ehsan Akbar
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    आँख ही दर्द पहचानती है
    मैं इस रूट पर
    पहेली गाड़ी का मेहमाँ था
    बे-तरह घूमती गेंद पर अब नफ़स जितने अन्फ़ास का और मेहमान है
    उन की गिनती मिरी दास्ताँ में नहीं
    ख़ाक की नाफ़ से ख़ाक के बत्न तक
    चंद साआ'त की रौशनी
    पोशिशें बत्तियाँ ताज़ा मोडल क्लब
    ताज़ा-रुख़ गाड़ी और बान और गुल-चेहरा इंटरप्रेटर
    यही चार-आइना चेहरा
    कि चेहरे में तस्वीर-ए-अय्याम से
    रौनक़ों में बसे इस तिलिस्मात में
    दिन जो वीराँ कटे
    जो शीशें घनी रात में खो गईं
    सो गईं
    आसमानों पे ख़ाली का चाँद
    नाक-नक़्शा बिखरने पे क़ादिर हुआ
    जिस की तहवील में दो मुँदे दाएरे आँख के हैं
    फ़क़त आँख के हाथ पर नक़्श हैं आँख ख़ाली नहीं
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    Ehsan Akbar
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    सहर के अगर ऐसे लम्हात में जागते हो
    सितारे भी जब ऊँघ जाएँ
    अगर दूधिया चाँदनी के जवाँ जिस्म की मौत देखे हुए हो
    अगर सोच में सर खुजाते दरख़्तों की
    वीराँ पुर-असरार तन्हाइयों बीच
    पिछले सितारे की छाँव तले
    गाम दो गाम
    सोई हुई साअ'तों में
    चले हो
    तो तुम हम से हो
    तुम मगर तब कहाँ थे
    सिधारत ने जब आख़िरी रात में
    दो सितारों के माथों पे बोसा दिया
    और आफ़ाक़ में खो गया
    दूर सदियों की पहनाई पर
    मैं जो हैराँ खड़ा देखता था
    अकेला कई क़र्न रोता रहा हूँ
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    Ehsan Akbar
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    हवा से बात करो
    कहो कि उस की लगाई हुई गिरह न खुली
    वो धूल थम न सकी दिल के रुख़ जो उड़ती थी
    वो गर्द उठी नहीं जो आइनों पे बैठी थी

    सबास बात करो
    सबास बात करो क्या सवाल था उस का
    विसाल जिस का तअ'य्युन न था जुदाई से
    किसे पुकार गया

    सदास बात करो
    यही कि जिन को सर-ए-दश्त-ओ-बर पुकारा गया
    वो सर-कशीदा क़बाइल की सर-फिरी औलाद
    किस ज़मीं में खपी
    किस फ़लक का रिज़्क़ हुई

    क़ज़ा से बात करो
    क़ज़ा से बात मगर क्या
    कि हर क़बीला-ए-दर्द
    इक ऐसे जब्र-ए-अज़ल-याब का हवाला है
    जो पहले दिन की गवाही सनद में लाता है
    अगर जवाब से फिर इक सवाल बनता है
    फ़ना के वास्ते क्यूँ बाब-ए-हर्फ़ बाज़ रहे
    बहा जहान की ला है तो ला से बात करो
    इब्तिदास बात करो
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    Ehsan Akbar
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    ख़िज़ाँ में अब फूल आने वाले हैं
    तुम मगर साथ साथ रहना
    कि हम सवाब-ओ-ख़ता के क़िस्सों का ज़िक्र कर के
    फ़ज़ा को पहले ही इतना बोझल बना चुके हैं
    कि ख़ुश्क पत्ता भी गिरने लग जाए तो हवा सिसकियाँ सी लेती है चीख़ती है
    उदास लम्हों में रौशनी अपने साथ रखना
    तुम अपने हाथों की ओट कर के
    चराग़ लाओ
    तो याद रखना कि रौशनी से दियों को भरना
    करम नहीं है
    किसी पे एहसान तो नहीं है कि हम ने किरनें बिखेर दी हैं
    कि रौशनी सब की ज़िंदगी है
    गुलों की पस्पाइयों की राहों को रोकना हो तो नूर बाँटो
    कि रौशनी नक़्द-ए-ज़िंदगी है
    ख़िज़ाँ के फूलों से तुम न कहना
    गई रुतों की हलावतें क्या थीं रंग क्या था
    रुतों के ज़िंदा सियाक़
    मुर्दा सबाक़ से
    अपना रब्त क्या था
    हमें रुतों के मिटे निशानों से ढूँढ़ना हैं
    वो नाम
    जो याद रह गए हैं
    निशान बे-नाम सूरतों के
    जो कल उगेंगी

    चराग़ फूलों के
    इन हवाओं में
    जलना मुश्किल हैं
    जल गए तो
    उजाला जितना भी हो बहुत है
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    Ehsan Akbar
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    कुलाह-ए-कज बदल जाती है या अफ़सर बदलता है
    अभी खुलता नहीं क्या वक़्त का तेवर बदलता है

    ये देखा है कि महवर इस्तवा ऊपर बदलता है
    फ़लक सदियों पुरानी नीलगूँ चादर बदलता है

    दिलों में सोज़-ए-ग़म वाले धुएँ भी आरज़ूएँ भी
    अजम वाला मुसलमाँ हर सदी में घर बदलता है

    निशाँ-कर्दा घरों को छोड़ भागे घर जो लौटे हैं
    तो देखा पिछली शब दहलीज़ का नंबर बदलता है

    हर इक फ़िरऔन के अहवाल-ए-ग़र्क़ाबी जुदागाना
    कभी दरिया बदलता है कभी लश्कर बदलता है

    ज़माना एहतिरामन घूम जाता है उसी जानिब
    जो अच्छाई को इक इंसान रत्ती भर बदलता है

    हम अब मग़रिब के दस्त-आमोज़ दुनिया को नहीं लगते
    उग आएँ बाल-ओ-पर अपने तो बाल-ओ-पर बदलता है

    कोई दरवाज़ा भीतर की तरफ़ खुलता नहीं 'एहसाँ'
    वही अंदर की कालक है फ़क़त बाहर बदलता है
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    Ehsan Akbar
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    ख़बर नहीं कि कोई किस के इंतिख़ाब में है
    मगर जो शख़्स कल उभरेगा मेरे ख़्वाब में है

    जहान वालों के लाखों इधर उधर के जवाब
    हयात का तो सवाल आदमी के बाब में है

    हमें न घेरती शायद ये चार-दीवारी
    मगर ये ख़ाक जो इस आलम-ए-ख़राब में है

    ख़ुद अपने पर जो गए हैं वो तिफ़्ल कौन से हैं
    वो नस्ल कैसी है जिस का जहाँ अज़ाब में है

    नए जहान के में'मार पहले गुज़रेंगे
    फिर उस के बा'द वो दुनिया जो सिर्फ़ ख़्वाब में है

    अजब से नक़्श मैं दीवार-ओ-दर पे देखता हूँ
    बस आने वाले हैं जिन का सुख़न किताब में है
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    Ehsan Akbar
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    फिर मुझे कौन-ओ-मकाँ दश्त-ओ-बयाबाँ से लगे
    रू-ब-रू कौन था जो आईने हैराँ से लगे

    कुछ थी कम-हौसलगी अपनी थी कुछ बे-सब्री
    कुछ मुझे इश्क़ के हंगा
    में भी आसाँ से लगे

    वक़्त कटता रहा था अहद-ए-हुज़ूरी की फ़िराक़
    ज़ख़्म लगते रहे चाहे किसी उनवाँ से लगे

    ज़ीस्त हम हार के भी हाथ मिलाएँ तुझ से
    अपने ये हौसले शायद तुझे अर्ज़ां से लगे

    ज़िंदगी मेरे इज़ाफ़े मुझे वापस कर दे
    झाड़ दे ख़ार जो नाहक़ तिरे दामाँ से लगे
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