Iqbal Sajid

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Iqbal Sajid shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Iqbal Sajid's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मारा किसी ने संग तो ठोकर लगी मुझे देखा तो आसमाँ था ज़मीं पर पड़ा हुआ — Iqbal Sajid
सूरज हूँ ज़िंदगी की रमक़ छोड़ जाऊँगा मैं डूब भी गया तो शफ़क़ छोड़ जाऊँगा — Iqbal Sajid
पिछले बरस भी बोई थीं लफ़्ज़ों की खेतियाँ अब के बरस भी इस के सिवा कुछ नहीं किया — Iqbal Sajid
वो चाँद है तो अक्स भी पानी में आएगा किरदार ख़ुद उभर के कहानी में आएगा — Iqbal Sajid
मिले मुझे भी अगर कोई शाम फ़ुर्सत की मैं क्या हूँ कौन हूँ सोचूँगा अपने बारे में — Iqbal Sajid

Ghazal

संग-दिल हूँ इस क़दर आँखें भिगो सकता नहीं मैं कि पथरीली ज़मीं में फूल बो सकता नहीं लग चुके हैं दामनों पर जितने रुस्वाई के दाग़ इन को आँसू क्या समुंदर तक भी धो सकता नहीं एक दो दुख हों तो फिर उन से करूँ जी-भर के प्यार सब को सीने से लगा लूँ ये तो हो सकता नहीं तेरी बर्बादी पे अब आँसू बहाऊँ किस लिए मैं तो ख़ुद अपनी तबाही पर भी रो सकता नहीं जिस ने समझा हो हमेशा दोस्ती को कारोबार दोस्तो वो तो किसी का दोस्त हो सकता नहीं ख़्वाहिशों की नज़्र कर दूँ किस लिए अनमोल अश्क कच्चे धागों में कोई मोती पिरो सकता नहीं मैं तेरे दर का भिकारी तू मेरे दर का फ़क़ीर आदमी इस दौर में ख़ुद्दार हो सकता नहीं मुझ को इतना भी नहीं है सुर्ख़-रू होने का शौक़ बे-सबब ताज़ा लहू की फ़स्ल बो सकता नहीं याद के शोलों पे जलता है अगर मेरा बदन ओढ़ कर फूलों की चादर तू भी सो सकता नहीं हाथ जिस से कुछ न आए उस की ख़्वाहिश क्यूँ करूँ दूध की मानिंद मैं पानी बिलो सकता नहीं — Iqbal Sajid
साए की तरह बढ़ न कभी क़द से ज़ियादा थक जाएगा भागेगा अगर हद से ज़ियादा मुमकिन है तेरे हाथ से मिट जाएँ लकीरें उम्मीद न रख गौहर-ए-मक़्सद से ज़ियादा लग जाए न तुझ पर ही तेरे क़त्ल का इल्ज़ाम बदनाम तो होता है बुरा बद से ज़ियादा ख़्वाहिश है बड़ाई की तो अंदर से बड़ा बन कर ज़ेहन की भी नश्व-ओ-नुमा क़द से ज़ियादा देखूँ तो मेरे जिस्म पे शाख़ें हैं न पत्ते सोचूँ तो घना छाँव मैं बरगद से ज़ियादा रहने दो ख़लाओं में मेरी क़ब्र न खोदो है प्यार मुझे ख़ाक की मसनद से ज़ियादा आँखें तो लगी रहती हैं दरवाज़े की जानिब मिलती है ख़ुशी अपनी ही आमद से ज़ियादा क्या जानिए क्या बात है इक उम्र से 'साजिद' वीरान है टूटे हुए मरक़द से ज़ियादा — Iqbal Sajid
फेंक यूँँ पत्थर कि सत्ह-ए-आब भी बोझल न हो नक़्श भी बन जाए और दरिया में भी हलचल न हो खोल यूँँ मुट्ठी कि इक जुगनू न निकले हाथ से आँख को ऐसे झपक लम्हा कोई ओझल न हो है सफ़र दरपेश तो परछाईं की उँगली पकड़ राह में तन्हाई के एहसास से पागल न हो पहली सीढ़ी पे क़दम रख आख़िरी सीढ़ी पे आँख मंज़िलों की जुस्तुजू में राएगाँ इक पल न हो ज़ेहन ख़ाली हो गए हैं वक़्त के एहसास से सामने वो मसअला रख जिस का कोई हल न हो सब के ही सीनों में है फैला हुआ साँसों का हब्स कोई शहर ऐसा नहीं जिस की फ़ज़ा बोझल न हो लोग अक्सर अपने चेहरे पर चढ़ा लेते हैं ख़ोल तू जिसे सोना समझता है कहीं पीतल न हो जुस्तुजू उस पेड़ की क्यूँँ हो कि जो साया न दे हाथ उस डाली पे क्या पहुँचे कि जिस पर फल न हो रोज़-ओ-शब लगता रहे सोचों का मेला ज़ेहन में शोर से ख़ाली कभी एहसास का जंगल न हो गर्म कर 'साजिद' लहू को धीमी धीमी आँच से वक़्त से पहले तेरे जज़्बात में हलचल न हो — Iqbal Sajid
प्यासे के पास रात समुंदर पड़ा हुआ करवट बदल रहा था बराबर पड़ा हुआ बाहरस देखिए तो बदन हैं हरे-भरे लेकिन लहू का काल है अंदर पड़ा हुआ दीवार तो है राह में सालिम खड़ी हुई साया है दरमियान से कट कर पड़ा हुआ अंदर थी जितनी आग वो ठंडी न हो सकी पानी था सिर्फ़ घास के ऊपर पड़ा हुआ हाथों पे बह रही है लकीरों की आबजू क़िस्मत का खेत फिर भी है बंजर पड़ा हुआ ये ख़ुद भी आसमान की वुसअत में क़ैद है क्या देखता है चाँद को छत पर पड़ा हुआ जलता है रोज़ शाम को घाटी के उस तरफ़ दिन का चराग़ झील के अंदर पड़ा हुआ मारा किसी ने संग तो ठोकर लगी मुझे देखा तो आसमाँ था ज़मीं पर पड़ा हुआ — Iqbal Sajid
ऐसे घर में रह रहा हूँ देख ले बे-शक कोई जिस के दरवाज़े की क़िस्मत में नहीं दस्तक कोई यूँँ तो होने को सभी कुछ है मिरे दिल में मगर इस दुकाँ पर आज तक आया नहीं गाहक कोई वो ख़ुदा की खोज में ख़ुद आख़िरी हद तक गया ख़ुद को पाने की मगर कोशिश न की अनथक कोई बाग़ में कल रात फूलों की हवेली लुट गई चश्म-ए-शबनम से चुरा कर ले गया ठंडक कोई दे गया आँखों को फ़र्श-ए-राह बनने का सिला दे गया बीनाई को सौग़ात में दीमक कोई एक भी ख़्वाहिश के हाथों में न मेहंदी लग सकी मेरे जज़्बों में न दूल्हा बन सका अब तक कोई वो भी 'साजिद' था मेरे जज़्बों की चोरी में शरीक उस की जानिब क्यूँँ नहीं उट्ठी निगाह-ए-शक कोई — Iqbal Sajid
दुनिया ने ज़र के वास्ते क्या कुछ नहीं किया और हम ने शा'इरी के सिवा कुछ नहीं किया ग़ुर्बत भी अपने पास है और भूख नंग भी कैसे कहें कि उस ने अता कुछ नहीं किया चुप-चाप घर के सेहन में फ़ाक़े बिछा दिए रोज़ी-रसाँ से हम ने गिला कुछ नहीं किया पिछले बरस भी बोई थीं लफ़्ज़ों की खेतियाँ अब के बरस भी इस के सिवा कुछ नहीं किया ग़ुर्बत की तेज़ आग पे अक्सर पकाई भूख ख़ुश-हालियों के शहर में क्या कुछ नहीं किया बस्ती में ख़ाक अड़ाई न सहरा में हम गए कुछ दिन से हम ने ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कुछ नहीं किया माँगी नहीं किसी से भी हम-दर्दियों की भीख 'साजिद' कभी ख़िलाफ़-ए-अना कुछ नहीं किया — Iqbal Sajid