pichhle baras bhi boi theen lafzon ki khetiyan | पिछले बरस भी बोई थीं लफ़्ज़ों की खेतियाँ

  - Iqbal Sajid

पिछले बरस भी बोई थीं लफ़्ज़ों की खेतियाँ
अब के बरस भी इस के सिवा कुछ नहीं किया

  - Iqbal Sajid

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    वो चाँद है तो अक्स भी पानी में आएगा
    किरदार ख़ुद उभर के कहानी में आएगा

    चढ़ते ही धूप शहर के खुल जाएँगे किवाड़
    जिस्मों का रहगुज़ार रवानी में आएगा

    रख़्त-ए-सफ़र भी होगा मिरे साथ शहर में
    सहरा भी शौक़-ए-नक़्ल-ए-मकानी में आएगा

    फिर आएगा वो मुझ से बिछड़ने के वास्ते
    बचपन का दौर फिर से जवानी में आएगा

    कब तक लहू के हब्स से गरमाएगा बदन
    कब तक उबाल आग से पानी में आएगा

    सूरत तो भूल बैठा हूँ आवाज़ याद है
    इक उम्र और ज़ेहन गिरानी में आएगा

    'साजिद' तू अपने नाम का कतबा उठाए फिर
    ये लफ़्ज़ कब लिबास-मआनी में आएगा
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    Iqbal Sajid
    दुनिया ने ज़र के वास्ते क्या कुछ नहीं किया
    और हम ने शायरी के सिवा कुछ नहीं किया

    ग़ुर्बत भी अपने पास है और भूख नंग भी
    कैसे कहें कि उस ने अता कुछ नहीं किया

    चुप-चाप घर के सेहन में फ़ाक़े बिछा दिए
    रोज़ी-रसाँ से हम ने गिला कुछ नहीं किया

    पिछले बरस भी बोई थीं लफ़्ज़ों की खेतियाँ
    अब के बरस भी इस के सिवा कुछ नहीं किया

    ग़ुर्बत की तेज़ आग पे अक्सर पकाई भूख
    ख़ुश-हालियों के शहर में क्या कुछ नहीं किया

    बस्ती में ख़ाक अड़ाई न सहरा में हम गए
    कुछ दिन से हम ने ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कुछ नहीं किया

    माँगी नहीं किसी से भी हम-दर्दियों की भीख
    'साजिद' कभी ख़िलाफ़-ए-अना कुछ नहीं किया
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    Iqbal Sajid
    ऐसे घर में रह रहा हूँ देख ले बे-शक कोई
    जिस के दरवाज़े की क़िस्मत में नहीं दस्तक कोई

    यूँ तो होने को सभी कुछ है मिरे दिल में मगर
    इस दुकाँ पर आज तक आया नहीं गाहक कोई

    वो ख़ुदा की खोज में ख़ुद आख़िरी हद तक गया
    ख़ुद को पाने की मगर कोशिश न की अनथक कोई

    बाग़ में कल रात फूलों की हवेली लुट गई
    चश्म-ए-शबनम से चुरा कर ले गया ठंडक कोई

    दे गया आँखों को फ़र्श-ए-राह बनने का सिला
    दे गया बीनाई को सौग़ात में दीमक कोई

    एक भी ख़्वाहिश के हाथों में न मेहंदी लग सकी
    मेरे जज़्बों में न दूल्हा बन सका अब तक कोई

    वो भी 'साजिद' था मेरे जज़्बों की चोरी में शरीक
    उस की जानिब क्यूँ नहीं उट्ठी निगाह-ए-शक कोई
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    Iqbal Sajid
    प्यासे के पास रात समुंदर पड़ा हुआ
    करवट बदल रहा था बराबर पड़ा हुआ

    बाहर से देखिए तो बदन हैं हरे-भरे
    लेकिन लहू का काल है अंदर पड़ा हुआ

    दीवार तो है राह में सालिम खड़ी हुई
    साया है दरमियान से कट कर पड़ा हुआ

    अंदर थी जितनी आग वो ठंडी न हो सकी
    पानी था सिर्फ़ घास के ऊपर पड़ा हुआ

    हाथों पे बह रही है लकीरों की आबजू
    क़िस्मत का खेत फिर भी है बंजर पड़ा हुआ

    ये ख़ुद भी आसमान की वुसअत में क़ैद है
    क्या देखता है चाँद को छत पर पड़ा हुआ

    जलता है रोज़ शाम को घाटी के उस तरफ़
    दिन का चराग़ झील के अंदर पड़ा हुआ

    मारा किसी ने संग तो ठोकर लगी मुझे
    देखा तो आसमाँ था ज़मीं पर पड़ा हुआ
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    Iqbal Sajid
    वो चाँद है तो अक्स भी पानी में आएगा
    किरदार ख़ुद उभर के कहानी में आएगा
    Iqbal Sajid

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