Sahar Ansari

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@sahar-ansari

Sahar Ansari shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sahar Ansari's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

जिसे गुज़ार गए हम बड़े हुनर के साथ वो ज़िन्दगी थी हमारी हुनर न था कोई — Sahar Ansari
ये मरना जीना भी शायद मजबूरी की दो लहरें हैं कुछ सोच के मरना चाहा था कुछ सोच के जीना चाहा है — Sahar Ansari
शायद कि वो वाक़िफ़ नहीं आदाब-ए-सफ़र से पानी में जो क़दमों के निशाँ ढूँड रहा था — Sahar Ansari
जाने क्यूँँ रंग-ए-बग़ावत नहीं छुपने पाता हम तो ख़ामोश भी हैं सर भी झुकाए हुए हैं — Sahar Ansari

Ghazal

विसाल-ओ-हिज्र से वाबस्ता तोहमतें भी गईं वो फ़ासले भी गए अब वो क़ुर्बतें भी गईं दिलों का हाल तो ये है कि रब्त है न गुरेज़ मोहब्बतें तो गईं थी अदावतें भी गईं लुभा लिया है बहुत दिल को रस्म-ए-दुनिया ने सितमगरों से सितम की शिकायतें भी गईं ग़ुरूर-ए-कज-कुलही जिन के दम से क़ाएम था वो जुरअतें भी गईं वो जसारतें भी गईं न अब वो शिद्दत-ए-आवारगी न वहशत-ए-दिल हमारे नाम की कुछ और शोहरतें भी गईं दिल-ए-तबाह था बे-नाम हसरतों का दयार सो अब तो दिल से वो बे-नाम हसरतें भी गईं हुए हैं जब से बरहना ज़रूरतों के बदन ख़याल-ओ-ख़्वाब की पिन्हाँ नज़ाकतें भी गईं हुजूम-ए-सर्व-ओ-समन है न सैल-ए-निकहत-ओ-रंग वो क़ामते भी गईं वो क़यामतें भी गईं भुला दिए ग़म-ए-दुनिया ने इश्क़ के आदाब किसी के नाज़ उठाने की फ़ुर्सतें भी गईं करेगा कौन मता-ए-ख़ुलूस यूँँ अर्ज़ां हमारे साथ हमारी सख़ावतें भी गईं न चाँद में है वो चेहरा न सर्व में है वो जिस्म गया वो शख़्स तो उस की शबाहतें भी गईं गया वो दौर-ए-ग़म-ए-इन्तिज़ार-ए-यार 'सहर' और अपनी ज़ात पे दानिस्ता ज़हमतें भी गईं — Sahar Ansari
कहीं वो चेहरा-ए-ज़ेबा नज़र नहीं आया गया वो शख़्स तो फिर लौट कर नहीं आया कहूँ तो किस से कहूँ आ के अब सर-ए-मंज़िल सफ़र तमाम हुआ हम-सफ़र नहीं आया मैं वो मुसाफ़िर-ए-दश्त-ए-ग़म-ए-मोहब्बत हूँ जो घर पहुँच के भी सोचे कि घर नहीं आया सबा ने फ़ाश किया राज़-ए-बू-ए-गेसू-ए-यार ये जुर्म अहल-ए-तमन्ना के सर नहीं आया कभी कोई तेरे वादों का तज़्किरा छेड़े तो क्या कहूँ कि कोई नामा-बर नहीं आया फिर एक ख़्वाब-ए-वफ़ा भर रहा है आँखों में ये रंग हिज्र की शब जाग कर नहीं आया मेरे लहू को मेरी ख़ाक-ए-नागुज़ीर को देख यूँँ ही सलीक़ा-ए-अर्ज़-ए-हुनर नहीं आया न जाने ज़ब्त के हाथों 'सहर' पे क्या गुज़री बहुत दिनों से वो आशुफ़्ता-सर नहीं आया — Sahar Ansari