jise guzaar gaye ham bade hunar ke saath | जिसे गुज़ार गए हम बड़े हुनर के साथ

  - Sahar Ansari

जिसे गुज़ार गए हम बड़े हुनर के साथ
वो ज़िन्दगी थी हमारी हुनर न था कोई

  - Sahar Ansari

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    किसी भी ज़ख़्म का दिल पर असर न था कोई
    ये बात जब की है जब चारागर न था कोई

    किसी से रंग-ए-उफ़ुक़ ही की बात कर लेते
    अब इस क़दर भी यहाँ मो'तबर न था कोई

    बनाए जाऊँ किसी और के भी नक़्श-ए-क़दम
    ये क्यूँ कहूँ कि मिरा हम-सफ़र न था कोई

    गुज़र गए तिरे कूचे से अजनबी की तरह
    कि हम से सिलसिला-ए-बाम-ओ-दर न था कोई

    जिसे गुज़ार गए हम बड़े हुनर के साथ
    वो ज़िन्दगी थी हमारी हुनर न था कोई

    अजीब होते हैं आदाब-ए-रुख़्सत-ए-महफ़िल
    कि उठ के वो भी चला जिस का घर न था कोई

    हुजूम-ए-शहर में शामिल रहा और इस के बाद
    'सहर' उधर भी गया मैं जिधर न था कोई
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    Sahar Ansari
    जाने क्यूँ रंग-ए-बग़ावत नहीं छुपने पाता
    हम तो ख़ामोश भी हैं सर भी झुकाए हुए हैं
    Sahar Ansari
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    विसाल-ओ-हिज्र से वाबस्ता तोहमतें भी गईं
    वो फ़ासले भी गए अब वो क़ुर्बतें भी गईं

    दिलों का हाल तो ये है कि रब्त है न गुरेज़
    मोहब्बतें तो गईं थी अदावतें भी गईं

    लुभा लिया है बहुत दिल को रस्म-ए-दुनिया ने
    सितमगरों से सितम की शिकायतें भी गईं

    ग़ुरूर-ए-कज-कुलही जिन के दम से क़ाएम था
    वो जुरअतें भी गईं वो जसारतें भी गईं

    न अब वो शिद्दत-ए-आवारगी न वहशत-ए-दिल
    हमारे नाम की कुछ और शोहरतें भी गईं

    दिल-ए-तबाह था बे-नाम हसरतों का दयार
    सो अब तो दिल से वो बे-नाम हसरतें भी गईं

    हुए हैं जब से बरहना ज़रूरतों के बदन
    ख़याल-ओ-ख़्वाब की पिन्हाँ नज़ाकतें भी गईं

    हुजूम-ए-सर्व-ओ-समन है न सैल-ए-निकहत-ओ-रंग
    वो क़ामते भी गईं वो क़यामतें भी गईं

    भुला दिए ग़म-ए-दुनिया ने इश्क़ के आदाब
    किसी के नाज़ उठाने की फ़ुर्सतें भी गईं

    करेगा कौन मता-ए-ख़ुलूस यूँ अर्ज़ां
    हमारे साथ हमारी सख़ावतें भी गईं

    न चाँद में है वो चेहरा न सर्व में है वो जिस्म
    गया वो शख़्स तो उस की शबाहतें भी गईं

    गया वो दौर-ए-ग़म-ए-इन्तिज़ार-ए-यार 'सहर'
    और अपनी ज़ात पे दानिस्ता ज़हमतें भी गईं
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    Sahar Ansari
    कहीं वो चेहरा-ए-ज़ेबा नज़र नहीं आया
    गया वो शख़्स तो फिर लौट कर नहीं आया

    कहूँ तो किस से कहूँ आ के अब सर-ए-मंज़िल
    सफ़र तमाम हुआ हम-सफ़र नहीं आया

    मैं वो मुसाफ़िर-ए-दश्त-ए-ग़म-ए-मोहब्बत हूँ
    जो घर पहुँच के भी सोचे कि घर नहीं आया

    सबा ने फ़ाश किया राज़-ए-बू-ए-गेसू-ए-यार
    ये जुर्म अहल-ए-तमन्ना के सर नहीं आया

    कभी कोई तेरे वादों का तज़्किरा छेड़े
    तो क्या कहूँ कि कोई नामा-बर नहीं आया

    फिर एक ख़्वाब-ए-वफ़ा भर रहा है आँखों में
    ये रंग हिज्र की शब जाग कर नहीं आया

    मेरे लहू को मेरी ख़ाक-ए-नागुज़ीर को देख
    यूँ ही सलीक़ा-ए-अर्ज़-ए-हुनर नहीं आया

    न जाने ज़ब्त के हाथों 'सहर' पे क्या गुज़री
    बहुत दिनों से वो आशुफ़्ता-सर नहीं आया
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    Sahar Ansari
    शायद कि वो वाक़िफ़ नहीं आदाब-ए-सफ़र से
    पानी में जो क़दमों के निशाँ ढूँड रहा था
    Sahar Ansari
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