Yaqoob Rahi

Top 10 of Yaqoob Rahi

    ये तुंद-ओ-तेज़ हवा
    तिरी गली मिरे जंगल को जो मिलाती है
    हमारा विर्सा है
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    लफ़्ज़-ओ-मा'नी में
    संघर्ष जारी है
    सदियों से जारी है जारी रहे
    ख़ामुशी
    बे-हिसी क्यूँ है
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    रात-भर
    उस ख़रीदे हुए जिस्म से
    तुम हरारत निचोड़ो
    प्यास हिर्स-ओ-हवस की बुझाओ
    और जब सुब्ह के आईने में उभरता हुआ अक्स देखो तो मुँह मोड़ लो
    कि ये तअ'ल्लुक़ तुम्हारे लिए बाइ'स-ए-नंग है
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    तेरा एहसास है
    कि सहन-ए-ख़मोशी में उभरती हुई
    आहट कोई
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    जब भी धरती का कोई हिस्सा
    तुम्हें चुप सा दिखाई दे तो उस की ख़ामुशी को
    बे-हिसी को नाम मत दो
    सर्द गहरी ख़ामुशी का कर्ब समझो
    उस के सीने में दबे लावे की ज़िंदा धड़कनों का अक्स
    मुमकिन है
    तुम्हें ख़ुद अपने आदर्शों में रह रह कर नज़र आए
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    हवा-ए-सुब्ह-ए-नुमू दुश्मन-ए-चमन कैसे
    शिकार-ए-रश्क-ओ-रक़ाबत गुल-ओ-समन कैसे

    हिसार-ए-शाम-ओ-सहर और ज़ब्त-ए-अहल-ए-नफ़स
    निज़ाम-ए-जब्र में बेबस ये मर्द-ओ-ज़न कैसे

    न कोई बात हुई और न कोई दिल ही दुखा
    बुझे बुझे से ये शुराका-ए-अंजुमन कैसे

    न कोई हाथ उठा और न कोई ज़ेर हुआ
    तो फिर बताओ कि ये चाक पैरहन कैसे

    खुले तो किस पे खुले रंग-ए-ए'तिबार-ए-सुख़न
    ये साहिबान-ए-नज़र बद-गुमान-ए-फ़न कैसे
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    मुशाहिदा न कोई तजरबा न ख़्वाब कोई
    तमाम शेर-ओ-सुख़न हर्फ़-ए-इजतिनाब कोई

    इक इंतिज़ार-ए-मुसलसल में दिन गुज़रते हैं
    कि आते आते न आ जाए इंक़लाब कोई

    तमाम अहल-ए-ज़माना शिकार-ए-हिर्स-ओ-हवस
    करे तो कैसे करे अपना एहतिसाब कोई

    न इस क़दर ग़म-ओ-ग़ुस्सा को पी के रह जाना
    कि सब्र-ओ-ज़ब्त की आदत बने अज़ाब कोई

    तमाम उम्र सवालात पूछने वाले
    किसे मिला है जो तुझ को मिले जवाब कोई
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    कोई बादल तपिश-ए-ग़म से पिघलता ही नहीं
    और दिल है कि किसी तरह बहलता ही नहीं

    सब यहाँ बैठे हैं ठिठुरे हुए जम्मू को लिए
    धूप की खोज में अब कोई निकलता ही नहीं

    सिर्फ़ इक मैं हूँ जो हर रोज़ नया लगता हूँ
    वर्ना इस शहर में तो कोई बदलता ही नहीं
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    दर्द उस का उभर रहा होगा
    सारा नश्शा उतर रहा होगा

    बंद आँखों की सर्द झीलों में
    अक्स उस का सँवर रहा होगा

    रात से सुल्ह हो रही होगी
    उस का एहसास मर रहा होगा
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    Yaqoob Rahi
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    ख़ुद पे इल्ज़ाम क्यूँ धरो बाबा
    ज़िंदगी मौत है मरो बाबा

    रेत ख़्वाबों की हो कि दर्द के फूल
    अपनी झोली में कुछ भरो बाबा

    ख़ौफ़ की धुँद घेर लेगी तुम्हें
    क्या ज़रूरी है तुम डरो बाबा

    जंग जब उन से लाज़मी ठहरे
    उन से फिर जंग ही करो बाबा
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