10
0 Likes
9
0 Likes
रात-भर
उस ख़रीदे हुए जिस्म से
उस ख़रीदे हुए जिस्म से
तुम हरारत निचोड़ो
प्यास हिर्स-ओ-हवस की बुझाओ
और जब सुब्ह के आईने में उभरता हुआ अक्स देखो तो मुँह मोड़ लो
कि ये तअ'ल्लुक़ तुम्हारे लिए बाइ'स-ए-नंग है
Read Fullप्यास हिर्स-ओ-हवस की बुझाओ
और जब सुब्ह के आईने में उभरता हुआ अक्स देखो तो मुँह मोड़ लो
कि ये तअ'ल्लुक़ तुम्हारे लिए बाइ'स-ए-नंग है
8
0 Likes
7
0 Likes
6
0 Likes
हिसार-ए-शाम-ओ-सहर और ज़ब्त-ए-अहल-ए-नफ़स
निज़ाम-ए-जब्र में बेबस ये मर्द-ओ-ज़न कैसे
न कोई बात हुई और न कोई दिल ही दुखा
बुझे बुझे से ये शुराका-ए-अंजुमन कैसे
न कोई हाथ उठा और न कोई ज़ेर हुआ
तो फिर बताओ कि ये चाक पैरहन कैसे
खुले तो किस पे खुले रंग-ए-ए'तिबार-ए-सुख़न
ये साहिबान-ए-नज़र बद-गुमान-ए-फ़न कैसे
5
0 Likes
इक इंतिज़ार-ए-मुसलसल में दिन गुज़रते हैं
कि आते आते न आ जाए इंक़लाब कोई
तमाम अहल-ए-ज़माना शिकार-ए-हिर्स-ओ-हवस
करे तो कैसे करे अपना एहतिसाब कोई
न इस क़दर ग़म-ओ-ग़ुस्सा को पी के रह जाना
कि सब्र-ओ-ज़ब्त की आदत बने अज़ाब कोई
तमाम उम्र सवालात पूछने वाले
किसे मिला है जो तुझ को मिले जवाब कोई
4
0 Likes
कोई बादल तपिश-ए-ग़म से पिघलता ही नहीं
और दिल है कि किसी तरह बहलता ही नहीं
और दिल है कि किसी तरह बहलता ही नहीं
सब यहाँ बैठे हैं ठिठुरे हुए जम्मू को लिए
धूप की खोज में अब कोई निकलता ही नहीं
सिर्फ़ इक मैं हूँ जो हर रोज़ नया लगता हूँ
वर्ना इस शहर में तो कोई बदलता ही नहीं
3
0 Likes
2
0 Likes
ख़ुद पे इल्ज़ाम क्यूँ धरो बाबा
ज़िंदगी मौत है मरो बाबा
ज़िंदगी मौत है मरो बाबा
रेत ख़्वाबों की हो कि दर्द के फूल
अपनी झोली में कुछ भरो बाबा
ख़ौफ़ की धुँद घेर लेगी तुम्हें
क्या ज़रूरी है तुम डरो बाबा
जंग जब उन से लाज़मी ठहरे
उन से फिर जंग ही करो बाबा
1
0 Likes









