मुशाहिदा न कोई तजरबा न ख़्वाब कोई

तमाम शेर-ओ-सुख़न हर्फ़-ए-इजतिनाब कोई

इक इंतिज़ार-ए-मुसलसल में दिन गुज़रते हैं
कि आते आते न आ जाए इंक़लाब कोई

तमाम अहल-ए-ज़माना शिकार-ए-हिर्स-ओ-हवस
करे तो कैसे करे अपना एहतिसाब कोई

न इस क़दर ग़म-ओ-ग़ुस्सा को पी के रह जाना
कि सब्र-ओ-ज़ब्त की आदत बने अज़ाब कोई

तमाम उम्र सवालात पूछने वाले
किसे मिला है जो तुझ को मिले जवाब कोई

— Yaqoob Rahi

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