करो न ग़म, जो तुम्हारी वो हम-रिकाब नहीं
वो शाहज़ादी है, यूँँ सबको दस्तियाब नहीं
ये हुस्न का है तआ'रुफ़, यही हक़ीक़त भी
वो हुस्न हुस्न नहीं है, जो बा-हिजाब नहीं
अजब है क़ब्ल-ए-शब-ए-वस्ल कैफ़ियत दिल की
हमें क़रार नहीं है, उन्हे़ं भी ताब नहीं
ऐ साक़ी, मय-कदे के साथ तू फ़ना हो जा
जो तेरी मय से कोई रिंद फ़ैज़याब नहीं
तिरे सिवा मैं ग़ज़ल में किसे ख़िताब करूँँ
तिरे सिवा तो मिरा कोई इंतिख़ाब नहीं
जो जानना है मुझे, तो मिरा कलाम पढ़ो
ज़मन जहान की कोई खुली किताब नहीं
Read Full