उस के लब पर सदा ये रहा बा'द में
कू-ब-कू दर-ब-दर जा-ब-जा बा'द में
बख़्शा उस ने इन अश्कों को तर्ज़-ए-सुख़न
ज़ख़्म दे कर यूँ दी फिर दवा बा'द में
हम तो मुश्ताक़-ए-तस्वीर-ए-हमदम रहे
हर दफ़ा ख़त में लिक्खा मिला बा'द में
टालने वाला सब को जहाँ में था जो
बस क़ज़ा से न वो कह सका बा'द में
चंद लम्हों की थी लज़्ज़त-ए-आशिक़ी
सोज़-ए-हिज्राँ सभी को मिला बा'द में
रंज-ओ-ग़म देने वाले न बतला सके
होंगे कब ये ज़मन से जुदा बा'द में
— Zaman Zaidi ZAMAN















