अजब ढंग से है ख़फ़ा ज़िंदगानी

पता ढूँडती ला-पता ज़िंदगानी

कहीं पर है बर्क़-ए-बला ज़िंदगानी
कहीं पर है बाद-ए-सबा ज़िंदगानी

कि जो हमनवा थे, सभी खो चुके है
है यूँ दर्द में मुब्तला ज़िंदगानी

हमें जिस
में वो शाहज़ादी मिली थी
वही क़िस्सा फिर से सुना ज़िंदगानी

सदा दे के उस को बुलाते बुलाते
इधर हो गई बे-सदा ज़िंदगानी

कभी शीरीं लहजे में की गुफ़्तुगू तो
बनी है कभी ज़हर-बा ज़िंदगानी

बताओ "ज़मन" क्या कहोगे तुम उस दम
जो पूछा किसी ने, है क्या ज़िंदगानी?

— Zaman Zaidi ZAMAN

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