ले के अपनी अना मैं किधर जाऊँगा
जैसे मरते हैं सब मैं भी मर जाऊँगा
तुम अगर फूल हो मैं मुमाखी हूँ फिर
तुम जिधर जाओगी मैं उधर जाऊँगा
काम जो लग रहे हैं हैं मुमकिन नहीं
तुम इशारा करो मैं वो कर जाऊँगा
कब कहा मैं ने तुम उम्र भर साथ दो
देख भी लोगी गर मैं सँवर जाऊँगा
तोड़ कर पर्वतों को ही मूरत बनी
तुम ने तोड़ा है अब मैं निखर जाऊँगा
— Alankrat Srivastava















